NEP 2020 would bring a revolution in Indian Education System, CUSB VC Prof. H.C.S. Rathore

 

More than one month has passed since the official announcement of New Education Policy (NEP) 2020, and lots of discussions have already happened about its pros and cons. Now the time has come to find out the shortcomings and fix it for timely implementation of New Education Policy. I find NEP 2020 a historical step taken by the government and it would bring revolutionary change in the Indian Education system, said Prof. Harish Chandra Singh Rathore, Vice-Chancellor of Central University of South Bihar (CUSB) in an international webinar. The University organised an international webinar on New Education Policy in collaboration with Shiksha Sanskriti Utthan Nyas.

 

In the international webinar organised on the topic “Swayyta ki Kasauti par Nai Shiksha Niti”(Analysing New Education Policy in the parameters of Autonomy) around 250 participants from India and abroad participated and share their view about New Education Policy. The webinar was presided by CUSB VC Prof. Rathore who stressed upon the need of through discussions about pros and cons of New Education Policy, and implementing it at the earliest possible that would be an important contribution towards nation building.

 

Other prominent speakers of the international webinar were Prof. J.N. Sinha from Berry University, USA, Prof. Rajnish Shukla, VC, Mahatma Gandhi International Hindi University, Prof. Vijay Kant Das, Regional Coordinator, Shiksha Sanskriti Utthan Nyas and Prof. Durg Prasad Agrawal, National Coordinator, Shiksha Sanskriti Utthan Nyas. The speakers shared their views about New Education Policy and related aspects. The webinar was compared by Dr. Sudhanshu Kumar Jha, Head, Dept of History while the vote of thanks was given by Prof. Atish Prashar, Dean & Head, Dept. of Media, CUSB.

 

 

नई शिक्षा नीति लाएगा देश की शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधार , कुलपति प्रेफ़ेसर हरिश्चंद्र सिंह राठौर

 

केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा आधिकारिक घोषणा के पश्चात नई शिक्षा नीति के प्रावधानों एवं स्वायत्तता इत्यादि विषयों पर अब तक काफी चर्चा हो चुकी है। लेकिन अब सही समय आ गया है हम सब इसके क्रियान्वयन पर ध्यान दें साथ-ही-साथ इसे लागू करने के लिए इसके विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देने की अति आवश्यकता है। नई शिक्षा निति के मुख्य बिंदुओं पर विचार करने के साथ - साथ इससे जुड़ी छोटी-से-छोटी बिंदु पर ध्यान आकर्षित करने की ज़रूरत है | जब इससे जुड़े बिंदुओं एवं उससे संबंधित समस्याओं को रेखांकित कर लें उसके पश्चात उस समस्या के निदान के विषय मे सोंचने की जरूरत है तभी नई शिक्षा निति सफलतापूर्वक लागु हो सकती है। ये बातें दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के कुलपति प्रोफ़ेसर हरिश्चंद्र सिंह राठौर ने विवि एवं  शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी के अध्यक्षीय सम्बोधन में कहीं |  ‘स्वायत्तता की कसौटी पर नयी शिक्षा नीति’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता माननीय कुलपति प्रो. हरिश्चंद्र सिंह राठौर ने की। इस अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार में करीब 250 लोगों ने ऑनलाइन भाग लिया। जिसमें भारत के साथ-साथ अमेरिका से भी कई लोग शामिल थे। प्रो. राठौर  ने इस संगोष्ठी के माध्यम से सभी विद्वतजनों से आह्वान करते हुए कहा कि वे राष्ट्र निर्माण की भावना से नई शिक्षा नीति को लागू करवाने के लिए कमर कस लें तभी भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है |

 

उन्होंने बताया कि संगोष्ठी में आगे बिहार राज्य विश्वविद्यालय शिक्षा सेवा आयोग के सदस्य एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास से प्रान्त संयोजक प्रो. विजय कांत दास ने विषय प्रवेश के दौरान कार्यक्रम की शुरूआत में विषय की गंभीरता को स्पष्ट किया तथा चर्चा के लिए चयन विषय की रूप रेखा से भी सभी लोगों को अवगत कराया | प्रो. दास ने कहा कि विदेशी शिक्षा नीतियों को मूल्यवान प्रायोगिक समझ कर अपनी शिक्षा व्यवस्था को बदल देना पिछले कुछ वर्षों में कई गई सबसे बड़ी भूल थी। भारत के गौरवशाली इतिहास की रीढ़ रहे तक्षशीला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय ने हमारी पहचान विश्व में एक विश्व-गुरु के रूप में रखी थी,  जबकि अंग्रेजों ने आजादी के पहले मैकाले शिक्षा व्यवस्था लागू कर हमारी उस रीढ़ को तोड़ कर हमें सदियों पीछे धकेलने का प्रयास किया।

 

कार्यक्रम में सम्मानित अतिथि के रूप में अमेरिका के बैरी यूनिवर्सिटी से प्रो. जे. एन. सिंहा ने भारत के शिक्षा नीतियों और विदेशों में शिक्षा नीतियों के स्वायत्तता के व्यवहारिक पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने भारतीय गुरुकुल पद्धति और उसके व्यवहारिक सदगुणों की चर्चा करते हुए वर्तमान शिक्षा नीतियों को भारत के लिए आने वाले समय के लिए अच्छा बताया। वेब संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश शुक्ला ने अपने महत्वपूर्ण विचार रखें। उन्होंने कहा कि इस बार शिक्षा नीति में जो अमूल-चूक बदलाव नजर आ रहे हैं। यह पूरे 185 वर्षों के बाद हमें प्राप्त हुई है। भारत में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल हो रहे हैं। परन्तु हम पहले से शिक्षा के मूल्यों को सही रूप से स्थापित कर चुके थे। विगत एक सदी से हमारे यहां भाषा और भारतीय शिक्षा पद्धति को लेकर संतोषपूर्ण कार्य नहीं हुए और यही कारण है कि हम अंग्रेजी और हिन्दी की लड़ाई में उलझ गए हैं।

वहीँ विशिष्ट अतिथि के रूप शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय संयोजक प्रो. दुर्ग प्रसाद अग्रवाल ने नई शिक्षा नीति की स्वायत्तता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने शिक्षा नीति और भारतीयता की चर्चा करते हुए यह बताया कि स्वायत्तता को हर स्तर पर शामिल करना होगा। इसका फैलाव प्रशासनिक स्तर होना चाहिए। इसमें छात्रों और शिक्षकों को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने स्वायत्तता की इस नई पहल से भारत को आने वाले समय में नई उँचायों पर पहुंचाने की रूपरेखा पर बात की। 

 

 इस कार्यक्रम का संचालन सीयूएसबी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुधांशु कुमार झा ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का धन्यवाद ज्ञापन मीडिया विभाग के अध्यक्ष प्रो. आतिश पराशर ने किया। उन्होंने सभी मुख्य अतिथियों को इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए धन्यवाद दिया। संगोष्ठी को सफल बनाने के लिए सभी लोगों को बधाई दी। इस दौरान उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति नए भारत के निर्माण को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। आने वाली सदियों में ये शिक्षा नीति भारत में कौशल पूर्ण शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा करेगी। जिससे लोग अपने कौशल के बदौलत आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार कर सकें।

 

 

 

 

 

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